भारत-नेपाल सीमा आतंकवादियों के महफूज रास्ता बन गई है। इस साल चार बड़े आतंकवादी विभिन्न राज्यों से लगी नेपाल सीमा से पकड़े जा चुके हैं। इसमें आईएम आतंकी यासीन भटकल भी शामिल रहा है, जिसे 29 अगस्त को बिहार के नेपाल बार्डर से पकड़ा गया। इसके साथ उत्तर प्रदेश के सोनौली सीमा से 13 सितंबर को एक आतंकवादी को पूरे परिवार के साथ नेपाल के जरिए पाकिस्तान से आते हुए हिरासत में लिया गया। हालांकि एसएसबी या खुफिया के लोगों का कहना था कि वह आतंकवादी वारदात छोड़ पुनर्वास नीति के तहत भारत आया था। वैसे इस साल नेपाल के रास्ते भारत आने वाले आतंकवादियों की संख्या 200 से अधिक है। ये सभी जम्मू कष्मीर सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आतंक का रास्ता छोड़ पाकिस्तान से आए हैं। इनमें से कुछ फिर आतंकवाद में लिप्त हो जाएं तो कैसे रोका जाएगा। इस तरह की नीति की सफलता कितनी होगी। वैसे जम्मू कशमीर में हाल की घुसपैठ को देखते हुए नेपाल सीमा पर चैकसी बढ़ा दी गई है। खासतौर से केरन सेक्टर के शालबटटू गांव पर पाकिस्तानी सेना के बैट दस्ते और आतंकवादियों के कब्जे के बाद। इसे कारगिल की तरह का घुसपैठ माना जा रहा है।
भारत की 1808 किलोमीटर सीमा नेपाल से लगी है। भारत के 26 जिले नेपाल से जुड़े हुए हैं। भारत-नेपाल सीमा पूरी तरह से खुली हुई है। कहीं तारबंदी नहीं है। निषान के लिए जगह-जगह पिलर लगाए गए हैं। दोनों देषों के नागरिक खुली सीमा से आसानी से आते जाते हैं। कुछ जगहों पर एसएसबी तैनात है तो अधिकतर जगहों पर सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। खुली सीमा का फायदा काफी समय से आतंकवादी उठा रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में इनकी गतिविधियां बढ़ गई हैं। इसका एक बड़ा कारण जम्मू कशमीर सरकार आतंकवाद का रास्ता छोड़ चुके लोगों के लिए पुनर्वास नीति है। यह उन आतंकवादियों के लिए चलाई जा रही है जो इस समय पाकिस्तान में रह रहे हैं। इसी नीति के तहत आतंकवादी नेपाल के जरिए भारत में आ रहे हैं। कुछ तो सच में आतंक की राह छोड़ चुके हैं, लेकिन उनके भेष मेें ऐसे भी आ रहे हैं, जो अब आतंकवाद में लिप्त हैं। पिछले छह महीने चार बड़े आतंकवादी भारत नेपाल सीमा से ही पकड़े गए।
इसमें पहला नाम लियाकत अली षाह का है। उसे 20 मार्च को नेपाल सीमा के सोनौली से एसएसबी ने गिरफतार किया। उसके साथ उसकी बीवी, बच्चे और अन्य थे। आईबी की सूचना पर एसएसबी को यह सफलता मिली थी। हिजबुल के आतंकवादी सैयद लियाकत अली शाह की निषानदेही पर 22 मार्च को दिल्ली पुलिस की स्पेशलल सेल ने जामा मस्जिद इलाका स्थित एक गेस्ट हाउस से भारी मात्रा में विस्फोटक, एके 56 राइफल, ग्रेनेड और अन्य सामान बरामद किया। लियाकत शाह की जम्मू-कश्मीर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को बीते डेढ़ दशक से तलाश थी। सुरक्षाबलों से बचने के लिए वह 1997 में गुलाम कश्मीर भाग गया था। पुलिस के अनुसार लियाकत शाह उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा से सटे लोलाब-कुपवाड़ा का रहने वाला है। उसका बड़ा भाई मंजूर शाह भी आतंकी था और शुरू में दोनों भाई अल-बरक नामक आतंकी संगठन के साथ जुड़े थे। 1993 में उसका भाई एक मुठभेड़ में मारा गया। लेकिन लियाकत सुरक्षाबलों को चकमा देकर भागने में कामयाब रहा।
दूसरा आतंकवादी अब्दुल करीम टुंडा रहा। बम बनाने में मास्टर टुंडा को 16 अगस्त को उत्तराखंड के बनबासा महेंद्रनगर बार्डर से पकड़ा गया था। लष्कर ए ताइबा का यह आतंकी वह भारत में कई जगह हुए विस्फोटों में षामिल रहा।
तीसरे आतंकवादी यासीन भटकल उर्फ मोहम्मद अहमद सिद्विबप्पा और आईएम आतंकी असदुल्लाह अख्तर रहा। इन दोनों को उत्तरी बिहार के भारत-नेपाल बार्डर से 29 अगस्त को गिरफतार किया गया। भटकल मोस्ट वांटेड की लिस्ट में था। उसने अपने भाई रियाज के साथ इंडियन मुजाहिदीन की स्थापना की थी। 2010 में भारत सरकार ने इंडियन मुजाहिदीन को आतंकी संगठन घोषित किया था। वाराणसी, दिल्ली, मुंबई के अलावा गोरखपुर के गोलघर में हुए बम विस्फोट में भटकल का हाथ था। भटकल को पूर्वांचल के आतंकवादियों का आका कहा जाता है। पूर्वांचल से जुड़े आरिज उर्फ जुनैद, खालिद, साजिद, वासिक और डाॅ षहनवाज जैसे कई नाम हैं जो भटकल से जुड़े हैं। इनमें से अधिकतर आजमगढ़ के हैं। बाटला हाउस कांड के बाद से ही आजमगढ़ का नाम सुर्खियों में है। यहां के सात युवाओं की तलाष एनआईए को है। जिस असदुल्लाह को भटकल के साथ पकड़ा गया था, वह भी आजमगढ़ का रहने वाला है। उस पर 10 लाख रूपये का इनाम था। 42 केस उस पर दर्ज हैं।
अब देखा जाए तो हाल के दिनों में बड़े आतंकवादियों को पकड़ने में सुरक्षा एजेंसियों को जो सफलता मिली वह अनायास ही नहीं है। सभी चार बड़े आतंकवादी नेपाल बार्डर से ही दबोचे गए। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो सोनौली सीमा से 120 संदिग्ध लोग नेपाल से भारत आते समय पकड़े जा चुके हैं। बीते साल मई में ही 37 और दिसंबर में 16 संदिग्ध कष्मीरी पकड़े गए थे। अभी फरवरी में ही कई संदिग्ध कष्मीरियों को पकड़ा गया था। बाद में उन्हें दिल्ली ले जाकर छोड़ दिया गया। उनके बारे में बताया गया कि वे आतंकवादी नहीं हैं। महज घूमने के लिए आए थे। लेकिन सच्चाई यह थी कि वे आतंकवादी रह चुके थे। सितंबर में सोनौली बार्डर से पांच संदिग्ध कष्मीरियों को पकड़ा गया। सभी इस्लामाबाद से नेपाल होते हुए भारत में आए।
देखा जाए तो जम्मू कष्मीर आतंकवादियों के लिए जो पुनर्वास नीति चला रही है उसके तहत आतंकवाद का रास्ता छोड़ने वाले कष्मीर जाने के लिए नेपाल का रास्ता क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं! वे बाघा बार्डर का इस्तेमाल कर सकते हैंै। इससे इस तरह की हायतौबा नहीं मचती। सूत्र कहते हैं कि आतंकवाद का रास्ता छोड़ने वाले नेपाल सीमा को इसलिए इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि बहुत से भारत में घुसने के बाद आतंकवादियों की मदद करते हैं। पकड़े गए तो जम्मू कष्मीर सरकार की नीति के तहत छूट जाते हैं, नहीं तो आतंकी हित साधते हैं। आंकड़ों के अनुसार पुनर्वास नीति के तहत 2010 में करीब 300 आतंकवादी पाकिस्तान से जम्मू कष्मीर आए। इस साल तक यह आंकड़ा करीब एक हजार बताई जा रही है।
भारत नेपाल सीमा के सोनौली पर तैनात एसएसबी के कमांडेेंट केएस बनकोटी का कहना है कि सीमा की सुरक्षा के लिए जवान हमेषा मुस्तैद रहते हैं। किसी आतंकवादी का घुसना आसान नहीं है। सोनौली सीमा के जरिए जम्मू कष्मीर की पुनर्वास नीति के तहत कुछ लोग आते हैं। उन्हें सुरक्षा के बीच दिल्ली पहुंचा दिया जाता है। वहां पूछताछ के बाद आगे की कार्रवाई की जाती है।
हाल के दिनों में कष्मीर में बढ़ी आतंकी घटनाएं ये बताने के लिए काफी हैं कि आतंकवाद का रास्ता छोड़ घाटी में पहुंचे ये लोग षांति से जीवन बीता रहे हैं। निष्चित ही इनमें से कुछ आतंकवाद में लिप्त हो सकते हैं।
सोनौली से पहले भी पकड़े जा चुके हैं आतंकवादी
मुंबई विस्फोट का प्रमुख सूत्रधार याकूब मेनन भी पांच साल पहले सोनौली सीमा से पकड़ा जा चुका है। तीन साल पहले अक्तूबर 2010 में बब्बर खालसा के आतंकवादी मक्खन सिंह के अलावा बिलाल अहमद भट्ट भी गिरतार किए जा चुके हैं। देवरिया जिले का मूल निवासी मिर्जा दिलशाद बेग ने तो नेपाल में पूरा नेटवर्क बना लिया था। 1991 में सोनौली से आतंकवादी सुखविन्दर सिंह उर्फ राजू खन्ना को गिरतार किया गया। वह अत्याधुनिक असलहों की आपूर्ति करने के साथ ही आतंकियों के ठहरने का इंतजाम करता था। 1993 में गणतंत्र दिवस के मौके पर गोरखपुर के मेनका थियेटर में बम विस्फोट हुआ था। इसमें कोतवाली क्षेत्र के छोटे काजीपुर के नफीस उर्फ सुड्डू को गिरतार किया गया था। दाउद के कहने पर मिर्जा दिलशाद बेग ने इस घटना को अंजाम दिलाया था। इस घटना के एक साल बाद केंद्रीय खुफिया ब्यूरो की सूचना पर गोरखपुर के तिवारीपुर पुलिस ने एक कश्मीरी उग्रवादी को गिरतार किया था। उसके कुछ दिनों बाद देवरिया के रुद्रपुर में इकबाल अंसारी को पकड़ा गया। दिसम्बर 1992 में दिल्ली में हुए कई ट्रेनों में विस्फोट की घटना के मामले में बस्ती के डा. जलेश अंसारी को पकड़ा गया। इसी दौरान कट्टर आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सक्रिय सदस्य के रूप में आजमगढ़ के डा. मोबिन की गिरतारी के बाद खुफिया एजेंसियों को यह जानकारी हुई कि आजमगढ़ में भी आतंकी संगठनों की जड़े गहरी हैं। आज आजमगढ़ के 10 नाम इंडियन मुजाहिदीन की सूची में दर्ज हैं।
भारत की 1808 किलोमीटर सीमा नेपाल से लगी है। भारत के 26 जिले नेपाल से जुड़े हुए हैं। भारत-नेपाल सीमा पूरी तरह से खुली हुई है। कहीं तारबंदी नहीं है। निषान के लिए जगह-जगह पिलर लगाए गए हैं। दोनों देषों के नागरिक खुली सीमा से आसानी से आते जाते हैं। कुछ जगहों पर एसएसबी तैनात है तो अधिकतर जगहों पर सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। खुली सीमा का फायदा काफी समय से आतंकवादी उठा रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में इनकी गतिविधियां बढ़ गई हैं। इसका एक बड़ा कारण जम्मू कशमीर सरकार आतंकवाद का रास्ता छोड़ चुके लोगों के लिए पुनर्वास नीति है। यह उन आतंकवादियों के लिए चलाई जा रही है जो इस समय पाकिस्तान में रह रहे हैं। इसी नीति के तहत आतंकवादी नेपाल के जरिए भारत में आ रहे हैं। कुछ तो सच में आतंक की राह छोड़ चुके हैं, लेकिन उनके भेष मेें ऐसे भी आ रहे हैं, जो अब आतंकवाद में लिप्त हैं। पिछले छह महीने चार बड़े आतंकवादी भारत नेपाल सीमा से ही पकड़े गए।
इसमें पहला नाम लियाकत अली षाह का है। उसे 20 मार्च को नेपाल सीमा के सोनौली से एसएसबी ने गिरफतार किया। उसके साथ उसकी बीवी, बच्चे और अन्य थे। आईबी की सूचना पर एसएसबी को यह सफलता मिली थी। हिजबुल के आतंकवादी सैयद लियाकत अली शाह की निषानदेही पर 22 मार्च को दिल्ली पुलिस की स्पेशलल सेल ने जामा मस्जिद इलाका स्थित एक गेस्ट हाउस से भारी मात्रा में विस्फोटक, एके 56 राइफल, ग्रेनेड और अन्य सामान बरामद किया। लियाकत शाह की जम्मू-कश्मीर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को बीते डेढ़ दशक से तलाश थी। सुरक्षाबलों से बचने के लिए वह 1997 में गुलाम कश्मीर भाग गया था। पुलिस के अनुसार लियाकत शाह उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा से सटे लोलाब-कुपवाड़ा का रहने वाला है। उसका बड़ा भाई मंजूर शाह भी आतंकी था और शुरू में दोनों भाई अल-बरक नामक आतंकी संगठन के साथ जुड़े थे। 1993 में उसका भाई एक मुठभेड़ में मारा गया। लेकिन लियाकत सुरक्षाबलों को चकमा देकर भागने में कामयाब रहा।
दूसरा आतंकवादी अब्दुल करीम टुंडा रहा। बम बनाने में मास्टर टुंडा को 16 अगस्त को उत्तराखंड के बनबासा महेंद्रनगर बार्डर से पकड़ा गया था। लष्कर ए ताइबा का यह आतंकी वह भारत में कई जगह हुए विस्फोटों में षामिल रहा।
तीसरे आतंकवादी यासीन भटकल उर्फ मोहम्मद अहमद सिद्विबप्पा और आईएम आतंकी असदुल्लाह अख्तर रहा। इन दोनों को उत्तरी बिहार के भारत-नेपाल बार्डर से 29 अगस्त को गिरफतार किया गया। भटकल मोस्ट वांटेड की लिस्ट में था। उसने अपने भाई रियाज के साथ इंडियन मुजाहिदीन की स्थापना की थी। 2010 में भारत सरकार ने इंडियन मुजाहिदीन को आतंकी संगठन घोषित किया था। वाराणसी, दिल्ली, मुंबई के अलावा गोरखपुर के गोलघर में हुए बम विस्फोट में भटकल का हाथ था। भटकल को पूर्वांचल के आतंकवादियों का आका कहा जाता है। पूर्वांचल से जुड़े आरिज उर्फ जुनैद, खालिद, साजिद, वासिक और डाॅ षहनवाज जैसे कई नाम हैं जो भटकल से जुड़े हैं। इनमें से अधिकतर आजमगढ़ के हैं। बाटला हाउस कांड के बाद से ही आजमगढ़ का नाम सुर्खियों में है। यहां के सात युवाओं की तलाष एनआईए को है। जिस असदुल्लाह को भटकल के साथ पकड़ा गया था, वह भी आजमगढ़ का रहने वाला है। उस पर 10 लाख रूपये का इनाम था। 42 केस उस पर दर्ज हैं।
अब देखा जाए तो हाल के दिनों में बड़े आतंकवादियों को पकड़ने में सुरक्षा एजेंसियों को जो सफलता मिली वह अनायास ही नहीं है। सभी चार बड़े आतंकवादी नेपाल बार्डर से ही दबोचे गए। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो सोनौली सीमा से 120 संदिग्ध लोग नेपाल से भारत आते समय पकड़े जा चुके हैं। बीते साल मई में ही 37 और दिसंबर में 16 संदिग्ध कष्मीरी पकड़े गए थे। अभी फरवरी में ही कई संदिग्ध कष्मीरियों को पकड़ा गया था। बाद में उन्हें दिल्ली ले जाकर छोड़ दिया गया। उनके बारे में बताया गया कि वे आतंकवादी नहीं हैं। महज घूमने के लिए आए थे। लेकिन सच्चाई यह थी कि वे आतंकवादी रह चुके थे। सितंबर में सोनौली बार्डर से पांच संदिग्ध कष्मीरियों को पकड़ा गया। सभी इस्लामाबाद से नेपाल होते हुए भारत में आए।
देखा जाए तो जम्मू कष्मीर आतंकवादियों के लिए जो पुनर्वास नीति चला रही है उसके तहत आतंकवाद का रास्ता छोड़ने वाले कष्मीर जाने के लिए नेपाल का रास्ता क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं! वे बाघा बार्डर का इस्तेमाल कर सकते हैंै। इससे इस तरह की हायतौबा नहीं मचती। सूत्र कहते हैं कि आतंकवाद का रास्ता छोड़ने वाले नेपाल सीमा को इसलिए इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि बहुत से भारत में घुसने के बाद आतंकवादियों की मदद करते हैं। पकड़े गए तो जम्मू कष्मीर सरकार की नीति के तहत छूट जाते हैं, नहीं तो आतंकी हित साधते हैं। आंकड़ों के अनुसार पुनर्वास नीति के तहत 2010 में करीब 300 आतंकवादी पाकिस्तान से जम्मू कष्मीर आए। इस साल तक यह आंकड़ा करीब एक हजार बताई जा रही है।
भारत नेपाल सीमा के सोनौली पर तैनात एसएसबी के कमांडेेंट केएस बनकोटी का कहना है कि सीमा की सुरक्षा के लिए जवान हमेषा मुस्तैद रहते हैं। किसी आतंकवादी का घुसना आसान नहीं है। सोनौली सीमा के जरिए जम्मू कष्मीर की पुनर्वास नीति के तहत कुछ लोग आते हैं। उन्हें सुरक्षा के बीच दिल्ली पहुंचा दिया जाता है। वहां पूछताछ के बाद आगे की कार्रवाई की जाती है।
हाल के दिनों में कष्मीर में बढ़ी आतंकी घटनाएं ये बताने के लिए काफी हैं कि आतंकवाद का रास्ता छोड़ घाटी में पहुंचे ये लोग षांति से जीवन बीता रहे हैं। निष्चित ही इनमें से कुछ आतंकवाद में लिप्त हो सकते हैं।
सोनौली से पहले भी पकड़े जा चुके हैं आतंकवादी
मुंबई विस्फोट का प्रमुख सूत्रधार याकूब मेनन भी पांच साल पहले सोनौली सीमा से पकड़ा जा चुका है। तीन साल पहले अक्तूबर 2010 में बब्बर खालसा के आतंकवादी मक्खन सिंह के अलावा बिलाल अहमद भट्ट भी गिरतार किए जा चुके हैं। देवरिया जिले का मूल निवासी मिर्जा दिलशाद बेग ने तो नेपाल में पूरा नेटवर्क बना लिया था। 1991 में सोनौली से आतंकवादी सुखविन्दर सिंह उर्फ राजू खन्ना को गिरतार किया गया। वह अत्याधुनिक असलहों की आपूर्ति करने के साथ ही आतंकियों के ठहरने का इंतजाम करता था। 1993 में गणतंत्र दिवस के मौके पर गोरखपुर के मेनका थियेटर में बम विस्फोट हुआ था। इसमें कोतवाली क्षेत्र के छोटे काजीपुर के नफीस उर्फ सुड्डू को गिरतार किया गया था। दाउद के कहने पर मिर्जा दिलशाद बेग ने इस घटना को अंजाम दिलाया था। इस घटना के एक साल बाद केंद्रीय खुफिया ब्यूरो की सूचना पर गोरखपुर के तिवारीपुर पुलिस ने एक कश्मीरी उग्रवादी को गिरतार किया था। उसके कुछ दिनों बाद देवरिया के रुद्रपुर में इकबाल अंसारी को पकड़ा गया। दिसम्बर 1992 में दिल्ली में हुए कई ट्रेनों में विस्फोट की घटना के मामले में बस्ती के डा. जलेश अंसारी को पकड़ा गया। इसी दौरान कट्टर आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सक्रिय सदस्य के रूप में आजमगढ़ के डा. मोबिन की गिरतारी के बाद खुफिया एजेंसियों को यह जानकारी हुई कि आजमगढ़ में भी आतंकी संगठनों की जड़े गहरी हैं। आज आजमगढ़ के 10 नाम इंडियन मुजाहिदीन की सूची में दर्ज हैं।
